साहित्य केवल अर्थशास्त्र का या कामशास्त्र का प्रपंच नहीं। साहित्य तो राष्ट्र की बुद्धि का सामर्थ्य का शौर्य का प्रतीक है। जिस राष्ट्र की बढ़त समाप्त हो चूकी हो जो दुर्बल हो उसके साहित्यकार भी बढ़त शून्य बौने और दुर्बल ही होंगे। - वीर सावरकर
हमारा देश उसका निकट उदहारण है.. कभी हिंदी का दरबार लगा करता था!
Tuesday, February 28, 2012
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